10 वर्ष बाद पूर्व डी.जी.पी. पर अभियोग पंजीकृत” सरकार का आभार, सच’ मरता नहीं है सच जिन्दा रहता है।

10 वर्ष बाद पूर्व डी.जी.पी. पर अभियोग पंजीकृत” सरकार का आभार, सच’ मरता नहीं है सच जिन्दा रहता है।
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देहरादून– बी.एस. सिद्धू I.P.S. UP 1979 पूर्व पुलिस महानिदेशक, उत्तराखण्ड, जो रेलवे सुरक्षा बल, मुम्बई में मुख्य सुरक्षा आयुक्त के पद पर प्रतिनियुक्ति पर थे, ने वर्ष 2011 से अपना योगदान उत्तराखण्ड में देना शुरू किया था और तब प्रथम बार उत्तराखण्ड में अपर पुलिस महानिदेशक, Rules & Manual तथा CBCID के पद पर नियुक्त हुए थे।
भाजपा नेता रविन्द्र जुगरान ने पत्रकार वार्ता करते हुए बताया कि  बी.एस. सिद्धू ने अपने पद का दुरूपयोग करते हुए आरक्षित वन क्षेत्र वीरगिरवाली (पुरानी मसूरी रोड) राजपुर, देहरादून की लगभग 09 बीघा जमीन दिनांक 20.11.2012 को तथाकथित फर्जी नत्थूराम से जानबूझ और सोच समझकर भूमाफियाओं की तरह बैनामा करा लिया था, जबकि नत्थूराम वर्ष 1983 में मर चुका था । इस भूमि को दिनांक 01.05.1970 के गजट नोटिफिकेशन के आधार पर तत्कालीन उ.प्र. सरकार द्वारा आरक्षित वन क्षेत्र घोषित कर दिया गया था जो तभी से वन विभाग के कब्जे में थी। दिनांक 05.07.2012 को फर्जी नत्थूराम ने मेरठ के रहमुद्दीन आदि के विरूद्ध कूटरचित अभिलेखों के आधार पर इसी संदर्भित भूमि को कब्जाने का एक मुकदमा लिखाने से विवादित हुई जमीन को तथा एग्रीमेन्ट की एक शर्त कि Demarcation के बाद बैनामा कराया जायेगा लेकिन Demarcation की कार्यवाही के प्रतिवेदन को दिनांक 26.10.2012 को एस.डी.एम… सदर- देहरादून के द्वारा निरस्त किये जाने के बावजूद फिर भी बी.एस. सिद्धू ने जोर जबरदस्ती पर उतारू होकर भूमाफियाओं की तरह तथाकथित मृतक नत्थूराम से दिनांक 20.11.2012 को उक्त जमीन का बैनामा अपने नाम करा लिया था।
बी.एस. सिद्धू इतने पर ही नहीं रूके, मार्च 2013 में संदर्भित भूमि से दो बार में पहले 04 फिर 21 साल के पेड़ व अन्य प्रजाति के कुल 25 पेड़ों का अवैध पातन भी कराया और दिनांक 13.03.2013 को आरक्षित वन क्षेत्र की भूमि का अपने नाम पर तत्कालीन अपर तहसीलदार, सदर- देहरादून से दाखिल-खारिज भी दबाव बनाकर अपने पक्ष में करा लिया, जबकि मृतक नत्थूराम के वारिसान व क्षेत्रीय लेखपाल ने दाखिल-खारिज न करने के लिए अपनी-अपनी आपत्तियां भी दर्ज करायी थी। बाद में बी.एस. सिद्धू के नाम का दाखिल-खारिज निरस्त हो गया था और भूमि वन विभाग के नाम दर्ज हो गयी थी। तत्कालीन अपर तहसीलदार सदर- देहरादून को वर्ष 2021 में सेवानिवृत होने के पश्चात राजस्व परिषद, उत्तराखण्ड के अध्यक्ष द्वारा इस भ्रष्ट आचरण के लिए मिलने वाली पारिवारिक पेंशन में से 2 प्रतिशत प्रतिमाह की कटौती किये जाने के आदेश से दण्डित भी किया है।

प्राथमिकता के आधार पर  बी. एस. सिद्धू के द्वारा अपने पद-पोजिशन के दुरूपयोग करने से शासन व सरकार को जनहित के तथ्यों से अवगत भी कराया था लेकिन दो अपराधिक वाद माननीय न्यायालय में दाखिल किये जाने के बावजूद  बी.एस. सिद्धू ने अपने पद – पोजिशन का दुरूपयोग करते हुए उन्हीं वन अधिकारी व कर्मचारियों के विरूद्ध तथ्यहीन मुकदमा बिना सरकार की अनुमति के थाना राजपुर में पंजीकृत करा दिया था।

जिन्होंने दो परिवाद  बी.एस. सिद्धू के विरूद्ध माननीय न्यायालय में दाखिल तत्कालीन आयुक्त गढ़वाल मण्डल व पुलिस महानिदेशक, उत्तराखण्ड के द्वारा प्रकरण की जांच कराने और भूमि की खरीद फरोख्त संदिग्ध होने के कारण अभियोग पंजीकृत कराने की संस्तुति के बाद भी बी.एस. सिद्धू के विरूद्ध अभियोग तो पंजीकृत नहीं हुआ लेकिन  बी. एस. सिद्धू जैसा एक अपराधी प्रवृति का व्यक्ति पुलिस के सर्वोच्च पद, पुलिस महानिदेशक जैसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन होने में सफल रहा जिनके विरूद्ध आगे चलकर NGT में भी वाद चला और अन्ततः 25 पेड़ों के अवैध पा से पर्यावरण को हुए नुकसान के कारण दिनांक 27.08.2018 को NGT द्वारा बी.एस. सिद्धू को लगभग 46 लाख रूपयों के अर्थदण्ड से दण्डित भी किया गया था।
तत्कालीन मुख्य सचिव, उत्तराखण्ड शासन के द्वारा NGT में इस आशय का शपथपत्र देने के बावजूद कि बी.एस. सिद्धू ने आरक्षित वन क्षेत्र की भूमि का अवैध रूप से बैनामा कराकर पेड़ों का पातन कराया और अपने पद-पोजिशन का दुरूपयोग कर वन विभाग के अधिकारी / कर्मचारियों के विरूद्ध थाना राजपुर में अभियोग पंजीकृत करा दिया था फिर भी बी.एस. सिद्धू के विरूद्ध कोई विभागीय या अनुशासनात्मक कार्यवाही तत्कालीन शासन द्वारा नहीं की गयी ।
बी. एस. सिद्धू की पिछली नियुक्ति रेलवे में प्रतिनियुक्ति पर रहने के दौरान CBI की ओर से आय के ज्ञात स्रोतों से 145% सम्पत्ति अधिक होने के कारण जांच करने मुकदमा पंजीकृत कर विवेचना किये जाने की अनुमति की मांग तत्कालीन सरकार द्वारा वर्ष 2012 मेंअनुमति नही दी गई, ओर महत्वपूर्ण पद पर पदोन्नत करने के विरूद्ध पुलिस महानिदेशक के पद से हटाने के सम्बन्ध में प्रकरण को माननीय उच्च न्यायालय, नैनीताल व उच्चतम न्यायालय दिल्ली तक ले जाने पर भी तत्कालीन उत्तराखण्ड शासन के असहयोग के कारण कोई सफलता नहीं मिली।
तत्कालीन जिलाधिकारी, देहरादून ने दिनांक 22.04.2016 को उत्तराखण्ड शासन को इस आशय की एक आख्या संस्तुति सहित प्रेषित की थी कि बी.एस. सिद्धू के प्रकरण की जांच किसी उच्च स्तरीय एवं स्वतंत्र एजेन्सी से कराना उचित होगा लेकिन इसके बावजूद तत्कालीन शासन बी.एस. सिद्धू को संरक्षण प्रदान करने की नीति पर ही चलता रहा और बी.एस. सिद्ध के विरूद्ध कोई अभियोग पंजीकृत नहीं कराया। ओर बी.एस. सिद्धू एक तानाशाह की तरह पुलिस विभाग के सर्वोच्च पद से दिनांक • 30.04.2016 को सेवानिवृत होने में सफल रहे थे।
सेवानिवृत होने से एक दिन पहले बी.एस. सिद्धू को उत्तराखण्ड शासन की ओर से एक विभागिय चार्जशीट मिली थी उसकी जांच कौन कर रहा है कुछ अता-पता नहीं है, जांच में क्या हुआ इसकी किसी को जानकारी नही दी गई।  बी.एस. सिद्धू के द्वारा आरक्षित वन क्षेत्र वीरगीरवाली, राजपुर की भूमि को कूटरचित अभिलेखों के आधारफर्जी नत्थूराम व अन्य अपराधियों के साथमांग करता हूं कि जो अभियोग 10 वर्ष पहले कायम होना चाहिए था उसके लिए जिम्मेदार अधिकारी या यदि अन्य कोई व्यक्ति जिम्मेदार है तो उसकी जांच एक उच्च स्तरीय SIT का गठन कर दोषियों के विरूद्ध विधि के अनुसार कार्यवाही करने का आदेश करने की कृपा करें। श्री बी. एस. सिद्धू के द्वारा किये गये अपराधों को मीडिया के माध्यम से तत्समय ही उजागर होने के बावजूद बी.एस. सिद्धू का पुलिस विभाग के सर्वोच्च पद, पुलिस महानिदेशक उत्तराखण्ड के पद पर आसीन होना और एक तानाशाह की तरह अपना कार्यकाल पूरा कर बी.एस. सिद्धू का सेवानिवृत होना उत्तराखण्ड शासन की कार्यप्रणाली पर निश्चित रूप से एक “काले धब्बे के समान है। इस “काले धब्बे के लिए कोई न कोई तो जिम्मेदार होगा, किसी न किसी की तो जवाबदेही तय करनी चाहिए।

“न्याय” पर अन्याय को भारी पड़ते देखा है, “सच” को भी कई बार दम तोड़ते और मरते देखा है, फिर भी मन में एक हलचल सी तो होती है, “सच” मरता नहीं है, “सच” जिन्दा रहता है।

राजपुर थाने में पूर्व डीजीपी बी एस सिद्धू के खिलाफ वन भूमि कब्जाने का मुकदमा दर्ज किया गया है। ऐसे में साल 2012 से इस मामले में मुकदमा दर्ज करने की मांग कर रहे रविंद्र जुगरान ने देहरादून प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता कर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का धन्यवाद दिया है। मामले को लेकर अदालत तक जाने वाले याचिकाकर्ता रविंद्र जुगरान का कहना है कि पिछले दस साल से मामला इस जांच से उस जांच के बीच घूम रहा था। लेकिन पुष्कर सिंह धामी ने बड़ी चोट करते हुए पूर्व डीजीपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के निर्देश दिए है। दूसरी तरफ तत्कालीन IO निर्विकार सिंह का कहना है की उन्होंने पूरे मामले की परत दर परत खोलनी शुरू की थी। जिसके बाद उनके खिलाफ भी अंदरखाने कार्यवाही की गई। वहीं आज उम्मीद जगी है की असल दोषी शिकंजो में जरूर फसेंगे।

पूर्व पुलिस महानिदेशक सेवानिवृत्ति बीएस सिद्धू को कार्रवाई को भाजपा नेता रविन्द्र जुगरान ने भ्रष्टाचार के अंधकार में रोशनी की किरण बताया है। उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती सरकार ने बीएस सिद्धू के खिलाफ मामलों का संज्ञान लिया होता, तो वह डीजीपी नही बनते। चयन समिति ने जिस तरह से तमाम आरोप नजरअंदाज किए, उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने भ्रष्ट व विवादित अफसरों को संरक्षण एवं प्रोन्नति देकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है। आय से अधिक संपत्ति सहित तमाम मामलो को स्वीकृति नही मिली।

पूर्व पुलिस महानिदेशक सिद्धू ने दी सफाई–     राजपुर थाने में मुकदमा दर्ज होने के बाद पहली बार मीडिया के सामने आकर पूर्व डीजीपी बी एस सिद्धू ने सफाई दी है। सिद्धू का साफ तौर पर कहना है कि वन विभाग लगातार उनके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटा रहा है। लेकिन फैसला इनके पक्ष में आया। वहीं अब शासन से अनुमति मिलने के बाद मुकदमा दर्ज होने की बात सामने आ रही है। मुझे लगता है की शासन को गुमराह किया गया है, सही तथ्य और अदालत के फैसले से शासन को अवगत नही कराया गया है। इसके बाद जो भी बात होगी वो जांच का विषय है।

Rupesh Negi

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