जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट पर टोल वसूली पर हाईकोर्ट की सख्ती, पर्यटकों के लिए खुला पार्क।
मसूरी– उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मसूरी स्थित विश्वप्रसिद्ध जॉर्ज एवेरेस्ट एस्टेट से जुड़े एक जनहित याचिका पर बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक सड़क पर किसी भी प्रकार की टोल वसूली अवैध है। मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र एवं न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया, कि यह याचिका स्थानीय नागरिक विनिता नेगी ने दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट के संचालन से जुड़े निजी ठेकेदार द्वारा कॉमन पार्क एस्टेट रोड पर टोल बैरियर लगाकर स्थानीय लोगों और पर्यटकों से शुल्क वसूला जा रहा है। हाईकोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश को अंतिम रूप देते हुए कहा कि सार्वजनिक सड़क पर चलने के लिए कोई टोल नहीं वसूला जा सकता। जॉर्ज एवेरेस्ट पार्क में प्रवेश शुल्क अलग विषय है, लेकिन सड़क पर बैरियर लगाकर पैसे लेना अनुचित है। आठवें प्रतिवादी (निजी ऑपरेटर) को स्थानीय लोगों या आम जनता से टोल वसूलने से रोका जाता है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश पार्क में प्रवेश को पूरी तरह निशुल्क घोषित नहीं करता, बल्कि केवल सड़क पर टोल वसूली पर रोक लगाता है।
जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की संपत्ति सड़क के अंत में स्थित है और वह सड़क “डेड एंड” जरूर है, लेकिन इससे उसका सार्वजनिक स्वरूप खत्म नहीं होता। कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) में कहीं भी सार्वजनिक सड़क पर टोल वसूलने का स्पष्ट अधिकार नहीं दिया गया है। ऐसे में शुल्क वसूली अपने आप में ही अवैध है।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जिस परियोजना का ठेका वर्ष 2022 में दिया गया और 2023 में अनुबंध हुआ, उसके खिलाफ याचिका 2025 में दायर की गई। इसके बावजूद, जनहित को ध्यान में रखते हुए अदालत ने मामले की सुनवाई की। याचिका में हेलिपैड, एयर सफारी, वन्यजीव अभयारण्य की निकटता, पर्यावरणीय मंजूरी और स्थानीय लोगों की भागीदारी जैसे मुद्दे भी उठाए गए थे,लेकिन सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही पहले दिए गए आदेश को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले का निस्तारण कर दिया। सुनवाई के बाद निजी प्रतिवादी के वकील ने कोर्ट में कहा कि लगाए गए बैरियर केवल ट्रैफिक नियंत्रण के लिए थे, न कि टोल वसूली के लिए। कोर्ट ने कहा कि अंतिम आदेश के बाद इस दलील पर अलग से विचार की आवश्यकता नहीं है। इस फैसले से स्थानीय निवासियों और मसूरी आने वाले पर्यटकों को बड़ी राहत मिली है। अब कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक सड़क का उपयोग करने के लिए शुल्क देने को बाध्य नहीं होगा। हाईकोर्ट का संदेश साफ है कि पर्यटन विकास के नाम पर आम जनता के अधिकारों का हनन स्वीकार्य नहीं।


