क्या गैरसैंण को लेकर गंभीर नहीं है उत्तराखंड सरकार,सत्र से परहेज तो फिर कैसे राजधानी गैरसैंण ?

क्या गैरसैंण को लेकर गंभीर नहीं है उत्तराखंड सरकार,सत्र से परहेज तो फिर कैसे राजधानी गैरसैंण ?
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देहरादून– उत्तराखंड राज्य आंदोलन का केंद्र बिंदु रहने वाला गैरसैंण आज गैर हो गया है। उत्तरप्रदेश से एक अलग राज्य उत्तराखंड बनाने के साथ ही उसकी राजधानी गैरसैंण को बनाने की मांग भी प्रमुख मुद्दा थी। राज्य आंदोलनकारियों और उत्तराखंड क्रांति दल ने समय-समय पर इसकी मांग के लिए आंदोलन तेज किया। अलग राज्य गठन का ये संघर्ष 9 नवंबर 2000 को केंद्र की तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में खत्म हुआ और उत्तराखंड को राज्य का दर्जा मिला। हालांकि फिर उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण न होकर अस्थाई देहरादून बन गई। इसको लेकर फिर से आंदोलन शुरू हुए और राज्य आंदोलनकारियों ने ‘पहाड़ी प्रदेश की राजधानी पहाड़ हो’ का नारा बुलंद किया। इसलिए गैरसैण को जनभावनाओं की राजधानी भी कहा जाने लगा। लेकिन राज्य गठन के 23 साल बाद भी गैरसैंण गैर ही है। जहां राज्य की पहले अंतरिम सरकार बीजेपी की थी, जिसमे मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी और भगत सिंह कोश्यारी रहे। तो उसके बाद साल 2002 से 2007 तक कांग्रेस सरकार में नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद एक बार फिर से उत्तराखंड की सत्ता बीजेपी को मिली। जिसमे मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी और डॉक्टर रमेश पोखरियाल निशंक रहे। 2012 से 2017 तक कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और हरिश रावत रहे। वहीं 2017 से लगातार बीजेपी की सरकार उत्तराखंड प्रदेश में है। अब जब गैरसैंण में बजट सत्र की मांग उठी तो मौजूदा सदन के कई विधायको ने विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी को पत्र लिखकर आगामी बजट सत्र देहरादून में ही आयोजित करने की मांग कर डाली है।

1992 में उत्तराखंड क्रांति दल ने गैरसैंण को औपचारिक राजधानी घोषित किया था। वहीं राजधानी के चयन के लिए गठित कौशिक समिति ने गैरसैंण को राजधानी के रूप में उपयुक्त बताया था। दूसरी तरफ राज्य की स्थायी राजधानी निर्माण के लिए गठित वीरेंद्र दीक्षित आयोग द्वारा गैरसैंण का भू सर्वेक्षण करवाया गया, किन्तु उन्होंने गैरसैंण में बहुत समस्याएं गिनाई और देहरादून को उपयुक्त राजधानी बताया, और गैरसैंण को खारिज कर दिया। जिसके बाद साल 2000 में बीजेपी की केंद्र सरकार में उत्तराखंड को अलग राज्य का दर्जा मिला, लेकिन स्थाई राजधानी नही मिली। उसके बाद 10 साल कांग्रेस तो उससे ज्यादा बार बीजेपी की उत्तराखंड में सरकार रही है। लेकिन राजधानी का मसला अभी भी उलझा हुआ है। हालांकि कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने 3 नवम्बर 2012 को पहली बार गैरसैंण में कैबिनेट बैठक आयोजित करवाई। कांग्रेस सरकार ने साल 2014 में गैरसैंण में विधानसभा सत्र आयोजित करवाने के साथ भराड़ीसैंण विधानसभा भवन का निर्माण शुरू करवाने का काम किया। दिसंबर 2016 में नवनिर्मित विधानसभा भवन में पहला विधान सभा सत्र आयोजित किया गया। वहीं विधान सभा चुनाव 2017 में बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में गैरसैंण को उत्तराखंड की ग्रीष्म कालीन राजधानी बनाने की घोषणा कर डाली। प्रदेश की आम जनता ने बीजेपी को सत्ता सौंपी और 8 जून 2020 को, चमोली जिले के अंतर्गत भराड़ीसैंण ( गैरसैंण ) को आधिकारिक रूप से उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया गया। इससे पहले मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने 4 मार्च 2020 को बजट सत्र के दौरान भराड़ीसैंण (गैरसैंण ) को उत्तराखंड की ग्रीष्म कालीन राजधानी घोषित किया था। वहीं गैरसैंण की लगातार होती अनदेखी को लेकर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा ने बीजेपी को आड़े हाथ लेने का काम किया है। कभी राज्य आंदोलन का केंद्र बिंदु रहा गैरसैंण आज कमजोर राजनेतिक इच्छा शक्ति का शिकार होता नजर आ रहा है। गैरसैंण को लेकर बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दलों की सरकारों ने दावे वादे जमकर लिए। लेकिन विधानसभा भवन के अलावा गैरसैंण में और कुछ भी नजर नहीं आया। जबकि भाजपा सरकार के पास पूरा मौका रहा की वो आगे बढ़कर गैरसैंण को लेकर बड़ा फैसला ले सकी। इन सबके बाद रही सही कसर मौजूदा सदन के विधायको ने पूरी कर डाली है जो पहाड़ी प्रदेश उत्तराखंड के गैरसैंण में अत्यधिक सर्दी की वजह से विधानसभा का सत्र नही चाहते।

Rupesh Negi

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