धामी सरकार ने की ग्राम उत्थान व कृषि विभाग के सहयोग से किसानों ने विलुप्त दून बासमती को दिलाई नई पहचान।
देहरादून– आज से सैकड़ों साल पहले बासमती चावल अफगानिस्तान के शाही परिवार से जुड़ा हुआ माना जाता था।, जिसको 19वीं सदी में अंग्रेजों द्वारा देहरादून घाटी में लाया गया था। इस चावल का उत्पादन देहरादून क्षेत्र में किया जाने लगा,यहां की जलवायु और मिट्टी इसे एक अनूठी सुगंध और स्वाद प्रदान करती है। शुरूआत में अंग्रेजों ने भारतीय किसानों से सिर्फ अपने उपयोग के लिए ही शुरूआत करायी थी। हालांकि, पारंपरिक बासमती की खेती के लिए पर्याप्त और समय पर सिंचाई की जरूरत होती है। पानी की उपलब्धता में कमी, नदियों और नहरों में प्रदूषण, और बारिश समय से न होना, मौसम के बदलाव ने खेती को प्रभावित किया और इसके बाद दून घाटी में तेजी से हुए शहरीकरण के कारण कृषि योग्य भूमि, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां कभी बेहतरीन बासमती उगाई जाती थी, उन क्षेत्रों में बहुत कमी देखी गई। किसानों ने आवासीय और व्यावसायिक निर्माण के लिए कृषि भूमि बेच दी। नदियों के किनारे ही बासमती चावल की पैदावार अच्छी हुआ करती थी, लेकिन नदियों के किनारे लगे क्रेशर, पोकलैंड, अवैध खनन के कारण कृषि जमीनों पर प्रभाव पड़ा, जिससे वहां पानी की कमी और धूल प्रदूषण के कारण किसानों की जमीन बंजर हो गई। इसके साथ ही बढ़ते तापमान, बारिश के तरीकों में अनिश्चितता और जलवायु-प्रेरित अन्य बदलावों ने चावल के पौधों की शारीरिक प्रक्रियाओं को प्रभावित किया। जिससे उपज और गुणवत्ता में गिरावट आई, जिससे बासमती चावल की पैदावार में कमी देखी गई। समय के साथ किसानों अत्यधिक उपज प्राप्त करने के लिए रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की उर्वरता और बासमती की प्राकृतिक सुगंध और स्वाद को खत्म कर दिया। सरकारी एजेंसियों द्वारा अधिक उपज देने वाली संकर किस्मों (हाईब्रिड वैरायटी ) को बढ़ावा देने से उस दौरान पारंपरिक देहरादून बासमती के शुद्ध बीज खो गए या अन्य किस्मों के साथ मिश्रित हो गए।
नई पीढ़ी के किसानों में धैर्य और पारंपरिक खेती तकनीकों की जानकारी की कमी भी एक मुख्य कारण है, क्योंकि पारंपरिक बासमती की खेती के लिए अत्यधिक देखभाल और समय की अधिक जरूरत होती है। आज के समय में दून घाटी में देहरादूनी बासमती की खेती में भारी गिरावट आई है, जो 2018 में 410 हेक्टेयर से घटकर 2022 में करीब 158 हेक्टेयर कृषि भूमि पर खेती की जाने लगी। बासमती चावल की खेती मुख्य रूप से सहासपुर, विकासनगर, रायपुर, और डोईवाला जैसे ब्लॉक के गांवों बरोटीवाला, प्रतीतपुर, धर्मावाला और नयागांव, सोरना डोबरी,तिलवाड़ी में ही सिमटकर रह गई है।
मुख़्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी दून की मशहूर बासमती चावल के पुनर्जीवन का संकल्प अब धरातल पर साकार होता हुआ दिख रहा है। जिला प्रशासन की दूरदर्शी पहल ने इस पारंपरिक और सुगंधित धान को फिर से नई पहचान और नई ऊर्जा प्रदान की है। दून बासमती, जो कभी देहरादून की पहचान और किसानों की शान थी, कई सालों से घटते उत्पादन और आधुनिक किस्मों की आड़ में लगभग समाप्त होती दिख रही थी। सीएम के स्पष्ट निर्देश और जिला प्रशासन की सक्रियता ने इस कीमती धान की पैदावार को फिर से जीवित किया है।
जिला प्रशासन की सराहनीय पहल की बदौलत देहरादून के सहसपुर और विकास नगर के किसानों ने दून बासमती की टाइप-3 खेती/फसल को विस्तार दिया गया। वहीं, नई पहचान के साथ अन्य किसानों को भी आगामी फसल के लिए प्रोत्साहित किया। किसानों के इस प्रयास ने न केवल इस पारंपरिक फसल को नई दिशा दी, बल्कि अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन गया। जिला प्रशासन की ओर से सहसपुर और विकास नगर के किसानों व समूह की महिलाओं को दून बासमती धान की अच्छी उपज के लिए ग्राम उत्थान और कृषि विभाग की ओर से प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन व बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराई गई। किसानों व महिला स्वयं सहायता समूह ने जिला प्रशासन की इस पल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
किसानों के खेती से लेकर प्रसंस्करण और बिक्री तक हर स्तर पर उनकी सक्रिय भागीदारी से दून बासमती के उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार आया है साथ ही उनकी आय में भी वृद्धि हुई है। ग्राम उत्थान विभाग द्वारा इन सभी किसानों व समूह की महिलाओं से 65 रुपये प्रति किलो के हिसाब से 200 से अधिक क़ुतंल दून बासमती धान की खरीद की गई है, जहां ग्राम उत्थान विभाग द्वारा किसानों को 13 लाख से अधिक का भुगतान भी कर दिया गया है। ग्राम उत्थान द्वारा खरीदे गए दून बासमती को हिलान्स और हाउस ऑफ हिमालय के माध्यम से दून बासमती को एक ब्रांड के रूप में स्थापित करने की दिशा में जिला प्रशासन की एक सराहनीय पहल है, जिससे न केवल दून बासमती धान को पुनर्जीवन मिलेगा। साथ ही स्थानीय समूह की महिला किसानों की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। दून बासमती धान से निकलने वाले बाय प्रोडक्ट से आगामी दिनों में समूह की महिलाओं को खेती से प्रसंस्करण एवं पैकेजिंग की सुविधा से रोजगार मिलेगा। वहीं दून बासमती धान की खेती कर रहे किसानों ने जिला प्रशासन की इस कदम को सफल बताते हुए कहा कि जो दून बासमती विलुप्त के कगार पर थी,वहां अब दोबारा बड़े स्तर पर खेती करके पुनर्जीवित किया जा रहा है। समूह की महिलाओं ने बताया कि देहरादून जिस दून बासमती के लिए जाना जाता था उसकी सुगंध और उसकी फसल अब जिला प्रशासन की पहल से दून में अलग पहचान से पहचानी जाएगी।
देहरादून जिला परियोजना प्रबंधक रीप कैलाश भट्ट ने बताया कि मुख्य विकास अधिकारी अभिनव शाह द्वारा दून बासमती को पुनर्जीवित करने की पहल वाकई में किसानों व समूह की महिलाओं के लिए लाभदायक साबित हुई है। उन्होंने बताया कि किसानों के द्वारा ही दून बासमती का मूल्य 65 रुपए किलो भी तय किया गया था। जिससे किसानों को भी अपनी फसल का सही दाम मिल सके।
मुख्य विकास अधिकारी ने बताया कि वर्तमान समय में दून बासमती विलुप्त हो रही प्रजाति को पुनर्जीवित करने के संकल्प से इस प्रोजेक्ट को शुरू किया गया है। दून बासमती को पुनः परंपरागत तरीके से पुनर्जीवित करने के लिए जिला प्रशासन द्वारा कार्य योजना बनाई गई। उन्होंने बताया कि सबसे पहले हमारे द्वारा परंपरागत तरीके से खेती करने वाले किसानों को चयनित किया गया। साथ ही इन सभी किसानों को क्लाइमेट चेंज के अनुसार प्रशिक्षण दिया गया है। उन्होंने बताया कि दून बासमती की फसल के बाद चयनित किसानों को कृषि विभाग द्वारा सर्टिफिकेट भी प्रदान किया गया, जिससे की दून बासमती धान को सर्टिफाइड किया जा सके।


