राजधानी के इस गांव में आज भी लोग कर रहें मौत का रस्ता पार, जाने कब मिलेगी राहत।
संकट में उत्तराखण्ड का ये गाँव,
देहरादून के सहसपुर विधानसभा का ये गांव के लोग झेल रहे कालापानी जैसी सजा,
आवाजाही के लिए कर रहे मौत की खाई को पार, सिस्टम ने इस गाँव को खुद के हाल पर छोड़ा।
यह दुर्भाग्य ही है कि राजधानी देहरादून से महज 30 किलोमीटर दूर स्थित सहसपुर विधानसभा के यह दूरस्थ गांव अपना अस्तित्व बचाने के लिये जूझ रहा है।
इस गाँव के ग्रामीण इन दिनों बड़ी परेशानी से घिरे हुए हैं और ये परेशानी इन ग्रामीणों के लिये सजा ऐ काला पानी जैसी साबित हो रही है।
इस गाँव में बरसात के चार माह ग्रामीण घरों में कैद हो जाते हैं, घर से बाहर जाना मौत को दावत देना जैसा प्रतित होता है, पूर्व में ये मुद्दा गरमाने के बाद जब समस्या का कोई स्थाई हल नहीं निकला तो ग्रामीणों को अस्थाई रूप से विस्थापित करने की बातें तो हुई,
लेकिन शासन प्रशासन और स्थानीय विधायक इसे हकीकत का रूप देने में अब तक विफल साबित हुए हैं। विपक्ष भी इस मुद्दे को लेकर मौन है।
विपक्ष का कोई नेता आज तक ग्रामीणों के हालात जानने नहीं पहुंचा कोई इन मुट्ठी भर ग्रामीणों का दर्द नहीं बांट रहा है।
दरअसल बटोली गांव और कोटी गांव के बीच एक लैंड स्लाइड जोन बना हुआ है, जहां पहाड़ी के ऊपरी हिस्से से हर साल पहाड़ी से टूटकर मलबा आता रहता है और लगभग चार माह के लिये ये यहां बनाया गया अस्थाई मार्ग पूरी तरह से बंद हो जाता है।
लेकिन इस बार जो हालात हैं, वो रूह कंपा देने वाले हैं, दरअसल यहां जमे हुए पुराने मलबे का पूरा पहाड़ रातों रात खिसक गया, जिसके चलते अब एक भयावह विशाल खाई यहां बन गई है।
बटोली गांव से मुख्यालय का संपर्क पूरी तरह से कट चुका है, बावजूद इसके ग्रामीण मजबूरी में जान को जोखिम में डालकर इस मौत की खाई से आना जाना कर रहे हैं। ग्रामीण गांव में कैद हो जाने को मजबूर हैं।
दुर्गम क्षेत्र में स्थित यह सुंदर गांव इस विकट समस्या के कारण वर्तमान में नरक का द्वार साबित हो रहा है। किसी भी आपातकाल की स्थिति में कौन जिम्मेदार होगा ये बड़ा सवाल भी बना हुआ है।
ग्रामीणों का कहना है कि पूर्व में भाऊवाला में सरकार द्वारा आयोजित बहुउद्देशीय शिविर में स्थानीय विधायक की मौजूदगी में ग्रामीणों को अस्थाई रूप से विस्थापन करने की बात की गई थी।
जिस पर सहमति भी बन गई थी, लेकिन आज तक इस दिशा में ना तो स्थानीय विधायक और ना शासन प्रशासन ने कोई ठोस कदम उठाए। आजादी के बाद से आज तक ग्रामीण इस समस्या का सामना कर रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या ज़ब तक कोई बड़ा हादसा नहीं हो जाता, क्या शासन प्रशासन किसी बडे हादसे होने का इंतजार कर रहा है, क्या स्थानीय विधायक और शासन प्रशासन तभी चेतेगा, क्या विधायक सिर्फ वोट मांगने तक ही सिमित है, नेताओ ने जो गांव के लोगों से किये वादे कसमे खाए वों क्या बरसात कि तेज़ बारिश में बह गए, स्थानीय लोगों का कहना हैं कि हमने कई बार शासन प्रशासन को पत्राचार किया गया पर हर बार अस्वाशन मिला कि जल्द ही समस्या का समाधान होगा, पर ना जाने कब समाधान मिलेगा कब इस काले पानी की सजा से मुक्ति मिलेगी।

