अरावली पर्वत को लेकर उत्तर भारत के कई राज्यों में प्रदर्शन, जल वैज्ञानिक नें शुरू की कई राज्यों की यात्रा।
देहरादून– अरावली पहाड़ियों के संबध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पर्वत की परिभाषा में बदलाव बताया गया हैं इसके बाद से पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ गई है। नए नियमों में बताया गया हैं की केवल 100 मीटर से अधिक ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली का हिस्सा माना जाएगा, जिससे लगभग 90 फीसदी अरावली क्षेत्र के खनन और निर्माण के लिए खुलने का अंदेशा जताया गया है। इस मुद्दे पर उत्तर भारत समेत पुरे भारत में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने नवम्बर 2025 में अरावली पर्वत की परिभाषा को बदल दिया और अब अरावली पर्वत को सिर्फ 100 मीटर से अधिक की ऊंचाई वाले पहाड़ी भाग के रूप में परिभाषित किया। 27 दिसम्बर 2025 को न्यायालय ने अपने पिछले फैसले की समीक्षा करने का निर्णय लिया और सुनवाई 29 दिसम्बर 2025 तक की लिए टाल दी थी। लेकिन विशेषज्ञओ का मानना हैं कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को खनन के लिए असुरक्षित मानते हैं, जो दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर(PM 2.5) को बढ़ा सकते हैं। चित्तौड़गढ़, नागौर, बूंदी और अलवर सहित कई क्षेत्रों में अरावली का अस्तित्व खतरे में है, जिससे जल संरक्षण और जैव विविधता को खतरा पैदा होगा। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि यह बदलाव खनन माफिया को लाभ पहुंचाने के लिए और 90फीसदी से अधिक अरावली को कानूनी सुरक्षा से बाहर करने की साजिश कि जा रही है।
अरावली गुजरात से दिल्ली तक फैली दुनिया की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखला है, जिसमें ऊँची चोटिया और घटिया है। हिमालय, एंडीज, आल्प्स और रॉकीज प्रमुख वलित पर्वत हैं। जो थार रेगिस्तान के फैलाओ को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस कारण इस क्षेत्र को पारिस्थितिक संरक्षण के लिए अरावली को पूरी तरह से संरक्षित क्षेत्र घोषित करने की मांग लगातार उठ रही है। अरावली की विरासत अगर खत्म हुई तो दिल्ली के राजपथ पर रेगिस्तान होगा, हरियाणा, पंजाब, यूपी ही नहीं देश के अधिकांश राज्य गर्मी की भीषण चपेट में होंगे। इसलिए अरावली को बचाया जाए ताकि जलवायु बचे और उन 11 सभ्याताओं को भी बचाया जा सकें जो अरावली से निकलती हैं। जल वैज्ञानिक डॉ. राजेंद्र सिंह ने यह विचार अरावली संरक्षण यात्रा का शुभारंभ करते हुए बताया कि यह यात्रा-700 किलोमीटर की दूरी 4 राज्यों से गुजऱती हुई 40 दिनों में पूरी होगी। उन्होंने कहा कि भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला की गोद में बसे समुदायों से मिलकर बातचीत करेंगे ताकि ग्रामीणों के जीवन के संघर्षों से दुनिया को परिचित करवा सकेंगे। मौजूदा सरकार के साथ ही उन्होंने कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका, मीडिया व युवाओं से अपील की है कि अपने पहाड़, जीवन बचाने के लिए आगे आना होगा क्योंकि अरावली सृजक पर्वतमालाएं हैं और यह खत्म हुई तो सनातनी सृजनशीलता भी खत्म होगी, नदियां, पानी, जीवन खत्म होगा। लोकेश भिवानी ने बताया कि हरियाणा का 80 फीसदी हिस्सा अरावली पर्वत खत्म हो गया है, इससे 3500 गांव का पानी पीने लायक नहीं बचा, वहां आर्सेनिक ज्यादा होने से किडनी खराब हो रही हैं। खनन के धमाकों से मकानों में दरार आ रही, कृषि पैदावार आधी रह गई, लोग पलायन कर रहे हैं। लोगों की हत्या हो रही है। आदिवासी एकता परिषद गुजरात से आईं विशेषज्ञ ने बताया कि अभियान की जरूरत हम सभी को और कहा कि गुजरात से दिल्ली तक इन पर्वतमालाओं के खत्म होने से मानव जीवन पर प्रभाव पड़ेगा और जीवन संकट पैदा होगा। टाइगर रिजर्व इलाके वाले ब्लॉक में भी खनन से कई गांव तबाह हो जाएंगे, इसलिए अरावली जरूरी हैं। पीपल फॉर अरावली की नीलम अहलूवालिया ने कानूनी पहलुओं पर कई सवाल खड़े किए तो वहीं सीकर के पर्यावरणविद कैलाश मीना ने भी अरावली की महत्तव पर ध्यान दिलाया।


