तीर्थ नगरी की छवि पर दाग, ऋषिकेश के आसपास कच्ची शराब का कुटीर उद्योग।
देहरादून/ऋषिकेश– उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सटे और तीर्थ नगरी ऋषिकेश के आसपास के क्षेत्रों में कच्ची शराब का अवैध कारोबार अब किसी छिपे हुए अपराध की तरह नहीं, बल्कि एक संगठित “कुटीर उद्योग” का रूप ले चुका है। रुष फॉर्म, गुमानीवाला, गंगा मनसा देवी और गुलरानी जैसे क्षेत्रों में बीते कई दशकों से यह कारोबार फल-फूल रहा है। हैरानी की बात यह है कि जिस इलाके को योग, ध्यान, अध्यात्म और शांति का प्रतीक माना जाता है। वहीं, खुलेआम जंगलों और आबादी के बीच जहरीली कच्ची शराब तैयार की जा रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह अवैध धंधा अब इस कदर फैल चुका है कि शाम ढलते ही नशेड़ियों की टोलियां सड़कों, गलियों और जंगलों के आसपास मंडराने लगती हैं। इसका सीधा असर न केवल सामाजिक वातावरण पर पड़ रहा है, बल्कि बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि जंगलों से सटे इलाकों में शराब बनाने का तरीका बेहद खतरनाक और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला है। जंगल के भीतर गड्ढे खोदकर उनमें लहान (गुड़ और पानी का घोल) भर दिया जाता है। कुछ दिनों में यह सड़-गलकर शराब में तब्दील हो जाता है, जिसे बाद में निकालकर बेचा जाता है। इसके अलावा कुछ लोग अपने घरों में भी बना रहे हैं। यह पूरी प्रक्रिया न तो किसी वैज्ञानिक मानक पर आधारित है और न ही स्वास्थ्य की दृष्टि से सुरक्षित। इसके बावजूद सस्ती शराब के लालच में लोग इसका सेवन कर रहे हैं, जिससे आए दिन स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं सामने आ रही हैं। स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि इसका सबसे बुरा असर नौनिहालों पर पड़ रहा है। बच्चे नशे के इस खुले प्रदर्शन को देखकर गलत दिशा की ओर जा रहे हैं। स्कूल से लौटते समय या खेलने के दौरान उन्हें असुरक्षित माहौल का सामना करना पड़ता है। इस अवैध कारोबार का दायरा सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है। जंगलों के भीतर रखे गए लहान को कई बार हाथियों व जंगली जानवरों के द्वारा पी लिए जाने की घटनाएं भी सामने आई हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि शराब पीने के बाद हाथी चिड़चिड़े और गुस्सैल हो जाते हैं। जब उन्हें दोबारा यह नशीला घोल नहीं मिलता, तो वे फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, घरों की ओर बढ़ आते हैं और तोड़फोड़ शुरू कर देते हैं। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष और अधिक बढ़ रहा है, जो भविष्य में बड़े हादसों को जन्म दे सकता है।
महिलाओं की भागीदारी, मजबूरी या संगठित नेटवर्क?
इस अवैध कारोबार का एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि इसमें कुछ महिलाएं भी शामिल बताई जा रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि आर्थिक तंगी और रोजगार के अभाव में कई महिलाएं इस धंधे में झोंकी जा रही हैं। हालांकि, सवाल यह भी उठता है कि क्या यह केवल मजबूरी है या फिर इसके पीछे कोई संगठित नेटवर्क काम कर रहा है, जो गरीब और कमजोर तबके को आगे रखकर खुद मुनाफा कमा रहा है।
पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर सवाल
स्थानीय निवासियों में इस बात को लेकर गहरी नाराजगी है कि पुलिस और प्रशासन इस पूरे मामले में मूकदर्शक बने हुए हैं। लोगों का आरोप है कि न तो नियमित गश्त होती है और न ही कभी कोई ठोस कार्रवाई नजर आती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार शिकायतें करने के बावजूद नतीजा शून्य रहा। कुछ लोगों का तो यहां तक कहना है कि अगर प्रशासन सख्ती बरते तो यह कारोबार एक हफ्ते में खत्म हो सकता है, लेकिन इच्छाशक्ति की कमी साफ दिखाई देती है।
राजधानी क्षेत्र में खुलेआम कानून की धज्जियां
यह तथ्य और भी गंभीर हो जाता है जब यह ध्यान में रखा जाए कि यह सब राजधानी क्षेत्र के अंतर्गत हो रहा है। देहरादून और ऋषिकेश जैसे महत्वपूर्ण शहरों के आसपास इस तरह का अवैध कारोबार राज्य की कानून-व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। यदि राजधानी के पास ही अवैध शराब का नेटवर्क इस कदर मजबूत है, तो दूर-दराज के इलाकों की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।
तीर्थ नगरी और आध्यात्मिक पहचान पर सीधा असर
ऋषिकेश को दुनिया भर में योग और अध्यात्म की राजधानी के रूप में जाना जाता है। हर साल देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु और पर्यटक यहां आते हैं,
लेकिन कच्ची शराब का यह खुला कारोबार तीर्थ नगरी की आध्यात्मिक छवि को गहरा आघात पहुंचा रहा है। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगी, तो इसका सीधा असर पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और राज्य की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी पड़ेगा।


