उत्तराखंड विधानसभा के बर्खास्त कर्मचारियों ने चौथे दिन विधान सभा के बाहर आर्टिकल 14 का मास्क पहन कर किया धरना प्रदर्शन।

उत्तराखंड विधानसभा के बर्खास्त कर्मचारियों ने चौथे दिन विधान सभा के बाहर आर्टिकल 14 का मास्क पहन कर किया धरना प्रदर्शन।
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देहरादून– विधानसभा में नियुक्ति फरवरी तथा मार्च 2016 में उपनल के माध्यम से विधानसभा सचिवालय में विभिन्न संवर्गों में नियमानुसार सृजित तथा रिक्त पदों पर विधानसभा की तात्कालिक आवश्यकताओं की दृष्टिगत रखते हुए की गई थी। जून 2016 में राज्य सरकार द्वारा उपनल के माध्यम से सैनिकों तथा उनके परिजनों के अलावा किसी को नियुक्ति प्रदान न करने का शासनादेश जारी किया गया। इसके बाद हमें विभागीय तदर्थ पर नियुक्ति प्रदान की गई।

वर्ष 2017 में हमारी नियुक्तियों को लेकर माननीय उच्च न्यायालय नैनीताल में एक पीआईएल ( 66 / 2017, राजेश चंदोला बनाम विधानसभा सचिवालय) दायर हुई थी, जिसमें हमारी नियुक्तियों को माननीय उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने वैध करार दिया था। इसके बाद राजेश चंदोला ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय में इस निर्णय के खिलाफ एसएलपी दायर की, जिसे वर्ष 2018 में भारत के मुख्य न्यायाधीश की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने डिसमिस करते हुए हाईकोर्ट के निर्णय पर मुहर लगा दी।

क्योंकि विधानसभा की 2011 में बनी नियमावली में तदर्थ नियुक्ति करने तथा छह माह बाद तदर्थ कर्मचारियों को विनियमित करने का प्रावधान है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद हमने वर्ष 2019 वर्ष 2021 तथा वर्ष 2022 में विधानसभा के माननीय अध्यक्षों को हमारी सेवाओं को विनियमित करने के लिए प्रत्यावेदन दिया, जिस पर कभी भी विधानसभा सचिवालय द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई।

26 सितंबर 2022 से 29 सितंबर 2022 के मध्य विधानसभा सचिवालय ने हमारी सात वर्ष की तदर्थ सेवाओं को भेदभावपूर्ण रवैया अपनाते हुए कोटिया कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर एक झटके में समाप्त कर हमें बाहर कर दिया। न हमें शो कॉज नोटिस दिया गया और न ही हमें सुनवाई का अवसर दिया गया, जो सीधे तौर पर नेचुरल जस्टिस की मूल भावना के खिलाफ है तथा भारत के संविधान के अनुच्छेद 311 का उल्लंघन है।

विधानसभा अध्यक्ष जी से हमारे सवाल

• कोटिया कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2001 से 2022 तक की सभी नियुक्तियां एक ही पैटर्न पर तथा एक जैसी ही प्रक्रिया के तहत हुई हैं तो सवाल यह उठता है कि विधानसभा अध्यक्ष जी द्वारा सिर्फ 2016 के उपरांत नियुक्त कार्मिकों की ही सेवाएं समाप्त क्यों की गईं। यह भेदभावपूर्ण कार्रवाई है तथा भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन भी है।

• जांच कमेटी के गठन के समय विधानसभा अध्यक्षा जी द्वारा यह कहा गया कि प्रथम चरण में 2011 के उपरांत नियुक्त कार्मिकों की जांच होगी और यदि जरूरत पड़ी तो उससे पहले वाले कार्मिकों की जांच की जाएगी। यह जरूरत उन्होंने क्यों नहीं महसूस की. यह बड़ा सवाल है।

• विधानसभा सचिवालय का माननीय उच्च न्यायालय में प्रस्तुत काउंटर एफिडेविट में कहना है कि विधानसभा में राज्य निर्माण से अभी तक हुई सभी नियुक्तियां अनियमित तथा अवैध हैं तो कार्रवाई 2016 के उपरांत नियुक्त कार्मिकों पर ही क्यों की गई 2016 से पूर्व नियुक्त कार्मिकों को क्यों बचाया जा रहा है।

• विधानसभा ने उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार यह कहा है कि वर्ष 2001 से वर्ष 2015 के बीच नियुक्ति कार्मिक नियमित हो गए हैं इसलिए उनके संबंध में विधिक राय ली जा रही है। लेकिन तीन महीने बीतने के बाद भी अभी तक विधानसभा ने कोई विधिक राय नहीं ली है। साफ है कि माननीय विधानसभा अध्यक्षा जी उन्हें बचाने का कार्य कर रही हैं।

सवाल यह उठता है कि जब नियुक्ति ही अवैध है तो विनियमितीकरण वैध कैसे हो सकता है। सवाल यहां पर कोटिया कमेटी पर भी है, जो यह तथ्य उजागर नहीं कर सकी और विनियमित हो चुके कर्मचारियों के संबंध में विधिक राय लेने की सलाह दे देती है। कमेटी के तीनों सदस्य रिटायर्ड आईएएस अधिकारी रहे हैं तथा कार्मिक मामलों के जानकार बताए जा रहे हैं तो यह फाइंडिंग देने से उन्होंने परहेज क्यों किया।

सवाल यह भी है कि कोटिया कमेटी ने क्यों नहीं विधिक राय स्वयं नहीं ली, जबकि इसके लिए वह सक्षम थी। प्रमुख सचिव विधायी तथा अपर सचिव विधायी का कक्ष जांच कमेटी के कक्ष से चंद कदम की दूरी पर था। क्यों नहीं उनसे सलाह ली गई। तीस दिन की जांच को क्यों 20 दिन में ही समेट दिया गया। दस दिन और इस पहलू की जांच की जा सकती थी।

• डीके कोटिया समिति ने कहा था की नियमित हो चुके कर्मचारियों के मामले में लीगल पहलू पर वो कुछ नहीं कह सकती, इसीलिए इस मामले में विधिक राय की जरूरत है जब कोटिया समिति विधिक मामलों में एक्सपर्ट नहीं थी, तो उन्होंने 2016 वाले कर्मचारियों के मामले में 2018 के हाईकोर्ट और 2019 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कैसे समीक्षा की। इससे साफ है की कोटिया समिति भी निष्पक्ष नहीं थी। वो भी पूर्वाग्रह और स्पीकर के प्रभाव में थी।

● जांच कमेटी ने क्यों नहीं हमारा पक्ष सुना। क्यों नहीं हमें जांच में शामिल होने के लिए बुलाया। यह नेचुरल जस्टिस की मूल भावना के खिलाफ हैं।

• वर्ष 2017 में माननीय उच्च न्यायालय नैनीताल में जो पीआईएल हमारी नियुक्तियों को लेकर हुई थी, उसमें विधानसभा ने अपने काउंटर एफिडेविट में हमारी नियुक्ति को वैध करार दिया था तथा यह भी कहा था कि सभी नियुक्तियां नियमानुसार हुई हैं तथा सभी नियुक्त कार्मिकों के पास सभी आवश्यक शैक्षिक योग्यताएं हैं लेकिन वर्ष 2022 में विधानसभा द्वारा उच्च न्यायालय में प्रस्तुत काउंटर एफिडेविट में यू टर्न लेकर हमारी नियुक्तियों को अवैध करार दिया जा रहा है, जो सरासर गलत और विधि विरुद्ध है।

• वर्ष 2002 से 2007 के बीच एनडी तिवारी जैसे मुख्यमंत्री के समय भर्ती हुई, जिन्हें केंद्र में वित्त, पेट्रोलियम मंत्री रहने के साथ ही यूपी जैसे बड़े राज्य का कई बार सीएम रहने का अनुभव रहा। उन्होंने तो अपने कार्यकाल में एक बार नहीं, बल्कि पांच बार विचलन से भर्ती का अनुमोदन देकर तदर्थ भर्ती को मंजूरी दी। क्या इस बैकडौर भर्ती के नियम और नियम टूटने की जानकारी तिवारी जैसे सीएम को नहीं थी। क्या उस समय के विधानसभा अध्यक्ष श्री यशपाल आर्य जी को नहीं थी।

2007 में राज्य के सबसे ईमानदार कहे जाने वाले सीएम बीसी खंडूड़ी के समय विचलन से भर्ती को मंजूरी देते हुए भर्ती की गई। उनके खुद के पर्यटन सलाहकार और अन्य करीबियों के परिचित भर्ती हुए। ऐसे में फिर एक्शन सिर्फ 2016 पर ही क्यों की गई। यह प्रयास क्या उन कर्मचारियों को बचाने का है, जिनकी नियुक्ति बीसी खंडूड़ी जी के सीएम रहते हुई थी और उन्होंने भी विचलन का प्रयोग किया था।

• विधानसभा के कर्मचारियों को बैकडोर कहा जा रहा है। जबकि इस समय राज्य में 25 हजार से अधिक बैकडोर कर्मचारी हैं। उपनल पीआरडी तथा अनेक आउटसोर्स एजेंसियो के जरिए 25 हजार से अधिक बैकडोर कर्मचारी काम कर रहे हैं। अकेले ऊर्जा निगमों में सात हजार से अधिक बैकडोर कर्मचारी हैं।

• जिन डीके कोटिया ने विधानसभा के तदर्थ कर्मचारियों को बैकडोर बताया है, उन्होंने स्वयं पब्लिक सर्विस ट्रिब्यूनल में रहते हुए बैकडोर भर्ती की ऊर्जा निगम, पिटकुल यूजेवीएनएल सिडकुल, महिला बाल विकास, कृषि, राज्य सहकारी बैंक, जिला सहकारी बैंक, राज्य सहकारी संघ, राज्य भंडार निगम, डेयरी, पशुपालन, तकनीकी शिक्षा, घुड़धौड़ी इंजीनियरिंग कालेज समेत तमाम संस्थानों ने बैकडोर भर्ती हुई हैं। ऐसे में अकेले कार्रवाई सिर्फ विधानसभा के 2016 वाले कर्मचारियों के खिलाफ ही क्यों की गई।

विधानसभा में 2014, 2015 में रखे गए कर्मचारी 2016 में ही नियमित कर दिए गए। वहीं विधानसभा अध्यक्ष श्रीमती ऋतु खंडूड़ी भूषण जी के पिता मेजर जनरल (अप्रा) भुवन चंद्र खंडूडी जी जब वर्ष 2007 में सीएम बने तो उनके विचलन से विधानसभा में नियुक्त करीब साठ कार्मिकों को पांच से छह साल की सेवा के बाद ही विनियमित किया गया था। हमारी भी सेवाएं छह वर्ष की हो चुकी हैं। तो यह भेदभाव हमारे साथ क्यों ।

Rupesh Negi

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